प्रस्तावना का आधार और संशोधन
September 20, 2026
स्तावना भारतीय संविधान की आत्मा है, जो संविधान के निर्माताओं के आदर्शों, लक्ष्यों और दृष्टि को संक्षेप में प्रस्तुत करती है। BPSC PT की दृष्टि से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक है क्योंकि इससे अक्सर सीधे तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
📜 प्रस्तावना का आधार और संशोधन
- उद्देश्य प्रस्ताव: प्रस्तावना का आधार पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objective Resolution) है, जिसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया गया था ।
- 42वाँ संशोधन (1976): मूल प्रस्तावना में समाजवादी (Socialist), पंथनिरपेक्ष (Secular) और अखंडता (Integrity) शब्द नहीं थे। इन्हें 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया ।
🔑 प्रस्तावना के चार मुख्य घटक
प्रस्तावना को मुख्य रूप से चार भागों में समझा जा सकता है :
⚖️ प्रस्तावना की संवैधानिक स्थिति
- क्या यह संविधान का हिस्सा है? — हाँ। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है और इसका संशोधन संभव है, बशर्ते वह संविधान के आधारभूत ढाँचे को क्षति न पहुँचाए । (पहले बेरुबाड़ी यूनियन मामले में इसे गैर-हिस्सा माना गया था, परंतु बाद में यह व्याख्या बदल दी गई) ।
- संविधान की व्याख्या में भूमिका: यह संविधान के निर्माताओं के मन को खोलने की कुंजी है और किसी अनुच्छेद के अर्थ में संदेह होने पर मार्गदर्शन का काम करती है ।
📝 BPSC PT के लिए मॉडल प्रश्न
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार किस प्रस्ताव से है?
- उत्तर: उद्देश्य प्रस्ताव (जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत)।
- प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द किस संशोधन द्वारा जोड़े गए?
- उत्तर: 42वाँ संविधान संशोधन, 1976।
- प्रस्तावना के अनुसार भारत का सार्वभौमिक सत्ता का स्रोत क्या है?
- उत्तर: “हम, भारत के लोग”।
- किस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना?
- उत्तर: केशवानंद भारती मामले (1973)।
💡 BPSC PT के लिए रणनीति
- तिथियाँ याद रखें: 13 दिसंबर 1946 (उद्देश्य प्रस्ताव), 22 जनवरी 1947 (स्वीकृति), 26 नवंबर 1949 (अंगीकृत), 42वाँ संशोधन (1976)।
- शब्दों का अर्थ स्पष्ट करें: ‘समाजवादी’ का अर्थ संपत्ति के निजी स्वामित्व का पूर्ण अंत नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक समानता है। ‘पंथनिरपेक्ष’ का अर्थ धर्म-तटस्थ राज्य है, धर्म-विरोधी नहीं ।
- विवादित बिंदु: बेरुबाड़ी मामले की पुरानी व्याख्या और केशवानंद भारती की नई व्याख्या का अंतर स्पष्ट रखें।