स्वदेशी आंदोलन (1905-08) और बिहार की बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका
यह आंदोलन सीधे तौर पर 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में शुरू हुआ था-3। इस दौरान पूरे भारत में “स्वदेशी” (देशी वस्तुओं का उपयोग) और “बहिष्कार” (विदेशी वस्तुओं का) का नारा गूंजा। चूंकि उस समय बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, इसका प्रभाव यहाँ भी गहरा पड़ा।
📜 बिहार में आंदोलन की विशेषताएँ
- बौद्धिक बहस का केंद्र: बिहार के बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेताओं ने इस आंदोलन को केवल अनुकरण नहीं किया, बल्कि इस पर गहन बहस भी की। उन्होंने बंगाल के प्रमुख नेताओं द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रवाद के हिंदू प्रतीकों और कल्पनाओं पर आधारित स्वरूप को चुनौती दी-1।
- व्यापक राष्ट्रवाद की वकालत: बिहारी बुद्धिजीवियों का मानना था कि सच्ची राष्ट्रीयता तभी विकसित हो सकती है, जब पिछड़े क्षेत्रों (जैसे बिहार) को विकास और एक अलग उप-राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान मिले-1। वे क्रांतिकारी हिंसक राष्ट्रवाद के भी विरोधी थे और अहिंसक संघर्ष पर जोर देते थे-1।
- स्थानीय प्रभाव: इस आंदोलन के दौरान बिहार में कई राष्ट्रीय विद्यालय खोले गए और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया गया। पटना की स्वदेशी समिति इस दिशा में विशेष रूप से सक्रिय रही।
BPSC के लिए विशेष: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि बिहार में यह आंदोलन गांधीजी के आगमन से पहले का था और यहाँ के नेताओं ने राष्ट्रवाद की एक अधिक समावेशी और अहिंसक व्याख्या प्रस्तुत की-1।
🌾 2. बिहार किसान सभा (1929) – संगठित किसान आंदोलन की नींव
चंपारण सत्याग्रह (1917) के बाद बिहार के किसानों में चेतना आई, लेकिन उनका शोषण (जमींदारों, महाजनों और अंग्रेज अधिकारियों द्वारा) जारी रहा। इसी पृष्ठभूमि में 1929 में बिहार किसान सभा की स्थापना हुई, जिसने किसानों को एक संगठित मंच दिया-2।
📜 स्थापना और प्रमुख पहलू
- संस्थापक: स्वामी सहजानंद सरस्वती को इसका प्रमुख संस्थापक माना जाता है। उन्होंने किसानों को संगठित करने के लिए ‘किसान‘ नामक पत्रिका भी निकाली।
- प्रथम अधिवेशन: इसका पहला अधिवेशन बिहारशरीफ (नालंदा) में हुआ, जो BPSC के लिए एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
- उद्देश्य: इसका प्रमुख लक्ष्य किसानों को जमींदारों के अत्याचारों, ऊँची ब्याज दरों और अन्यायपूर्ण करों के खिलाफ संगठित करना था-2।
- प्रमुख नेता: स्वामी सहजानंद के अलावा, रामवृक्ष बेनीपुरी, जगजीवन राम, पंडित यमुना करजी (गया) और पंडित अच्युतानंद जैसे नेता इस आंदोलन से जुड़े थे।
BPSC के लिए विशेष: बिहार किसान सभा (1929) और चंपारण सत्याग्रह (1917) में अंतर समझें। चंपारण में गांधीजी ने एक विशिष्ट समस्या (तिनकठिया प्रथा) के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि किसान सभा का उद्देश्य व्यवस्थागत शोषण के खिलाफ एक स्थायी संगठन बनाना था।
🎯 BPSC के लिए त्वरित तुलना तालिका
| पहलू | स्वदेशी आंदोलन (1905-08) | बिहार किसान सभा (1929) |
|---|---|---|
| समय | गांधी-पूर्व युग | गांधी-युग |
| मुख्य कारण | बंगाल का विभाजन, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार | किसानों का जमींदारी, कर और साहूकारी शोषण |
| प्रमुख केंद्र | पटना, भागलपुर (शिक्षा और बौद्धिक केंद्र) | बिहारशरीफ (प्रथम अधिवेशन), गया (सक्रिय आंदोलन) |
| प्रमुख नेता | सच्चिदानंद सिन्हा, मजहर-उल-हक, रामानंद चटर्जी | स्वामी सहजानंद, रामवृक्ष बेनीपुरी, जगजीवन राम |
| विशिष्ट योगदान | बिहारी बुद्धिजीवियों ने समावेशी राष्ट्रवाद की वकालत की-1 | किसानों को एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया-2 |